अपने उन्मुक्त हास्य से आस-पास के वातावरण को ध्वनिमुखर करदेनेवाले भास महेता के व्यक्तित्व की एक विशेषता है उनकी स्पष्ट वादिता। वस्तुतः यह एक ऐसा गुण है जो उनके व्यक्तित्व को पारदर्शी बना देता है। कोई भी बात कहनी हो, प्रतिक्रिया देनी हो वे बिना किसी दुराव-छिपाय या आवरण के कह देते है? उनका यह गुण उनकी जातिगत विशेषता है। वे स्वयं स्वीकारते हैं कि मैं नागर हूँ ना इसलिए साफ-साफ बोल देता हूँ।
स्पष्टवादिता की यह शक्ति बचपन से ही उनमें देखी जा सकती है। १९६१ में जब वे अंधशाला
अहमदाबाद में पाँचवी कक्षा के छात्र थे तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु अंधशाला की मुलाकात
हेतु पधारे। १० साल के बालक भास्कर महेताने ब्रेल का नकशा दिखाकर उसमें दिल्ली बताई। प्रभावित होकर नहेरुजीने कहा ‘दिल्ली चलना है’ बालकने उत्तर दिया मेरे पास पैसे नहीं है, यदि आप ले चलते हैं तो चलूँगा। बचपन की इस घटना में ही उनकी| स्पष्टवादिता का परिचय मिलता है। नेहरूजी जैसी शख्शियत के सामने जहाँ बड़े-बड़े लोग बोलने में संकोच का अनुभव करते थे वहीं भास्कर महेता बिना किसी संकोच के अपनी स्थिति का बयान कर देते हैं।
जैसे-जैसे समय, उम्र आगे बढती गई, जीवन का अनुभव गहरा होता गया वैसे-वैसे उनकी स्पष्टवादिता की शक्ति को धार मिलती गई। मगर एक बात उल्लेखनीय है कि प्राध्यापाक भास्कर महेता की स्पष्टवादिता किसी को मान मर्दन करने के लिए या किसी को आहत करने के लिए नहीं, बल्कि सत्य और नीति की हिमायत के लिए होती है। जब वे प्रांतिज कोलेज (जिला-साबलकाण्ठा) में प्राध्यापक के पद पर कार्य कर रहे थे तब उनके प्राचार्य ने उनसे पूछा कि आप तो नेत्रहीन हैं इसलिए आपके घरवाले आपकी तनरखाह की अपेक्षा नहीं रखते होंगे। भास्करभाईने तपाक से उत्तर दिया कि मुझे तनख्वाह अंधत्व की नहीं काम करने की मिलती है। काश! आप आँखें भूल गये होते और मैं पेट भूल गया होता तो कितना अच्छा होता। यदि आप नेत्रहीन व्यक्ति की आवश्यकता को ही नहीं समझा सकते हैं तो फिर बात ही क्या है।
ऐसा ही छोटा हो या बडा, प्रकाण्ड पंडित हो या बडे से बडा नेता यदि भास्कर भाई को उनकी बात रुचिकर प्रतीत नहीं होती तो वे बेबाकी से न केवल उसका खण्डन करते हैं बल्कि हकीकत का साक्षात्कारभी करवाते हैं। यहाँ पर एक प्रसंग का उल्लेख करना चाहूँगी। खेडब्रह्मा कोलेज के उद्घाटन के अवसर पर जब भास्करभाई प्राध्यापक प्रतिनिधिके रुप में मुख्यमंत्री का घेराव करने गये तो चर्चा के दौरान मुख्यमंत्रीने प्राध्यापकों से कहा कि एक-एक प्राध्यापक को कम से कम २४-२५ हजार तनख्वाह मिलती है और आप लोग काम केवल दो घण्टे करते हैं। सुनकर भास्कर भाईने कहा आपका शिक्षा विभाग इतना दानवीर कर्ण कब से हो गया है? असल में नेशनल स्कोलर को यह| वेतन मिलताथा जब कि आप अध्यापक को ढाई हजार वेतन देते थे। मुख्यमंत्री इससे अनजान थे। उन्होंने कहा कि आप देखते नहिं और बोलते हैं तब महेता साहब ने जवाब दिया कि अंधा देख नहीं सकता मगर सच बोल तो सकता है| स्पष्ट ही देखा जा सकता है कि उनके शब्दों की धार कहाँ पहुँच रही थी?
हर समय, हर क्षेत्र में उनकी स्पष्टवादिता सत्य का पक्ष लेती चलती है, विकलागों का हित करती रहती है। २००५ से २००८ तक जब वे गुजरात राज्य गांधीनगर में विकलांग कमिश्रर के पद पर आसीन थे तब भी निरंतर शासन व्यवस्था और उसकी शिथिलताओं पर साफ शब्दों में प्रहार करते रहे थे। उन्हें एक बार तो किसी मुद्दे पर मुख्यमंत्री से कहना पड़ा था कि अवरोधमैं नहीं विकलांगों के लिए आप कर रहे हैं। न तो आपने, न आपके आर्किटेक ने या न आपके इंजीनियर ने विकलांगों से पूछा कि अवरोधकि से है। यह सब तो आपकी इच्छानुसार हुआ है। यदि वास्तव में आप विकलागों के लिए कुछ करना चाहते हैं तो जरा पूछिये तो सही की उन्हें क्या चाहिए। इस वर्ग की तकलिफों का अनुभव भला आपको कैसे हो सकता है। भास्करभाई के व्यक्तित्व की एक लाक्षणिकता है कि उनकी स्पष्टवादिता में हाजर जवाबी धुली-मिली होती है। ऐसे अवसर पर प्रसंग पूरा रसमय हो जाता है।
मुंबई यात्रा के दौरान जब दौड़ते-भागते श्रीमती प्रवीणाबहन के साथ उन्होंने बस पकड़ी तो कंडक्टर ने कहा कि, “ऐ सूरदास इस ‘लुख्खी’ को लेकर कहाँ जा रहा है। भास्करभाई ने ‘लुख्खी’ शब्द का विशिष्ट अर्थ ग्रहण करते हुए कहा कि भाई तुझे तेरी बीवी लुख्की लगती होगी मुझे तो मेरी पत्नी हरी भरी लगती है। कंडक्टर के इस कथन में इम देख सकते हैं कि आम आदमी का विकलांगों के प्रति जो दृष्टिकोण है इसका स्तर कितना गिरा हुआ है। किंतु भास्करभाई ऐसे अवसरों पर बौखलाने या क्रोध करने के बजाय अपनी हाजिर जवाबी से उसे पूरा विनोद में बदल देते हैं। यही उनका बडप्पन है और व्यक्तित्व की सरसता भी। एक बार स्टाफ रूम में मित्रों ने उनसे कहा भास्करभाई आप अकेले बस में यात्रा करते हैं, प्लेन में जाते हैं, आधी-आधी रात को ईडर के बस-स्टेण्ड पर उतरते है रात के अँधेरे में आपको तकलीफ नहीं होती है। उन्होंने तुरंत जवाब दिया मुझ अंधे को क्या दिन और क्या रात? सब एक समान। सुनकर मैं हतप्रभ हो गइ। यदि भास्करभाई की जगह कोई और होता तो क्या यही जवाब होता? प्रश्र्घुमता रहा मेरे
दिलों दिमाग पर- कई दिनों तक।”
भास्करभाई की हाजर जवाबी किसी को नहीं बख्शती। वे खुद बडे चाव से कई बार किस्से सुनाते हैं। हमारे महाविद्यालय के पूर्व आचार्य स्वर्गीय श्री हरिहर शुक्ल साहबने एक बार उनको मजाक में कहा भास्करभाई अंधे होने के बहुँत लाभ है। बस में, ट्रेन में अग्रिमता, मकान बनवाने में अग्रिमता, व्यवसाय में तीन प्रतिशतकी छुट। लाभ ही लाभ है। तब भास्करभाई ने हँसते हुए जवाब दिया कि यदि दृष्टि गँवाने से ज्यादा लाभ मिलते है तो आप भी इस जमात में शामिल हो जाईये ना, और बहुत देरतक प्राचार्य का कक्ष हास्य से गूंजता रहा।
भास्करभाई की साफ गोई या हाजिर जवाबी में भी एक वैचारिकता निहित होती है। किसी की बात का केवल खण्डन करने या कुत्तर्क करने में वे नहीं मानते, बल्कि उनके कथन में एक ठोस चिंतन दिखाई देता है। वे हँसते-हँसते बहुँत बडी बात कह जाते हैं। एक बार एक प्राध्यापक मित्र ने उनसे कहा आपके संस्कृत साहित्य में श्रृंगार ज्यादा है, आजकल की फिल्मों की तरह। जवाब मिला मगर दोनों में अंतर है। फिल्मों में जब अनिच्छनीय होता है तब पर्दा उठता है और संस्कृत साहित्य में जब अनिच्छनीय होता है तब पर्दा गिरता है। कथन की यही भंगिमा बड़े से बड़े को निरुत्तर कर देती है।
षष्टिपूर्ति के अवसर पर मैं कामना करती हूँ कि भास्करभाई के व्यक्तित्व में निहित स्पष्टवादिता की शक्ति उत्तरोत्तर तेजस्विता ग्रहण करती रहे और वर्तमान में चारों तरफ फैले हुए दुषणों पर प्रहार करती रहें।